हाथी की मौत क्या बाकी जानवरों को भी इंसाफ दिलाएगी?

हाथी की मौत क्या बाकी जानवरों को भी इंसाफ दिलाएगी?

केरल में गर्भवती हथिनी की दर्दनाक मौत इंसानी क्रूरता की एक मिसाल बन चुकी है. केरल में एक गर्भवती हथिनी को विस्‍फोटकों से भरा अनानास खिलाया गया, जिससे मादा हाथी की मौत हो गई. वो हथिनी गांव में खाने की तलाश में आई थी. लेकिन वो वहां रहने वालों की शैतानी से अनजान थी. शायद उसने सोचा होगा कि गर्भवती होने की वजह से लोग उस पर दया करेंगे. उसने सभी पर भरोसा किया. जब उसने पटाखों से भरा अनानास खाया और वो उसके मुंह में ही विस्फोट कर गया तब उसे शायद ही यकीन हुआ हो कि कोई ऐसा भी सोच सकता है. पटाखों से भरा अनानास मुंह में फटने की वजह से हथिनी का जबड़ा बुरी तरह घायल हो गाया. इस वजह से हथिनी कई दिनों से कुछ भी खा-पी नहीं पा रही थी. हथिनी भूखी थी. जबड़े का दर्द कुछ कम हो, ये सोच कर हथिनी नदी में चली गई और तीन दिन तक वहीं पानी में जबड़ा डालकर खड़ी रही. लेकिन हथिनी को नदी में जबड़ा डालकर भी कुछ राहत नहीं मिली और आखिर में घटना के तीन दिन बाद हथिनी और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे ने इस दुनिया से ही रुकसत कर ली.

इस घटना को जिसने भी सुना, गुस्से से भर गया. सोशल मीडिया से लेकर हर तरफ लोग गर्भवती हथिनी के लिए इंसाफ की मांग करने लगे. लेकिन क्या हथिनी की मौत से दुनिया में मौजूद बाकि जीवों को भी इंसाफ मिल पाएगा? क्या सिर्फ ये गर्भवती हथिनी ही इंसानों की क्रूरता का शिकार हुई है? अगर लोग सोच रहे हैं कि इंसानों ने सिर्फ इस हाथी पर ही बर्बरता दिखाई है तो ऐसा सोचने वाले लोग गलत हैं. ऐसा सोचने वाले लोग भ्रम में जी रहे हैं क्योंकि दांत से लेकर खाल तक के लिए यहां जानवरों के साथ क्रूरता की जाती रही है. हथिनी की मौत पर इंसान उसके लिए इंसाफ मांगने के लिए मशाल जरूर जलाएगा लेकिन लंच या डिनर में वही इंसान किसी न किसी जानवर को अपना भोजन भी बनाएगा. लेकिन प्लेट में किसी जानवर को मारकर खाते वक्त इंसानों को जानवरों के प्रति बरती जा रही क्रूरता ध्यान में नहीं आएगी. इंसानों को अपने अधिकार बखूबी ध्यान में रहते हैं. लेकिन इंसान ये क्यों भूल जाता है कि उस बेजुबान जानवर को भी कुछ अधिकार मिले हैं.

भारत के संविधान का अनुच्छेद 51 (A) कहता है कि हर जीवित प्राणी के प्रति सहानुभूति रखना भारत के हर नागरिक का मूल कर्तव्य है. लेकिन इंसान अपने इस कर्तव्य का पालन करना भूल जाता है. इंसान इस कर्तव्य को हर बार नजर अंदाज करता आता है. सर्कसों में जंगली जानवरों को देखकर इंसान अपना मनोरंजन करता है और वही इंसान चिड़ियाघरों में जानवरों को देखने जाता है. जानवरों को चिड़ियाघरों में या खुद के घरों में पिंजरों में कैद रखना भी उनके लिए किसी यातना से कम नहीं है. जानवरों को जब इंसान अपना भोजन बनाता है तो जानवरों को एक बार ही कष्ट होता है. वहीं जानवरों को कैद में रखना उन्हें हर दिन कष्ट पहुंचाता है.

हथिनी की मौत का दुख भी लोगों में थोड़े दिनों तक जिंदा रहेगा. हथिनी के मौत पर दुख जताने वाले लोगों में नॉनवेज खाने वाले लोग भी होंगे. इनमें ऐसे लोग भी शामिल होंगे, जिन्हें जानवरों के चमड़े से बनी चीजें पहनने का शौक होगा. लेकिन जानवरों को मारकर खाना इंसानों को भूख शांत करने वाला लगता है और चमड़े से बनी चीजें पहनना फैशन और मजबूती का अहसास दिलाता है. लोग शायद ही कभी इन सब चीजों के लिए आवाज उठाएं. शायद एक हथिनी की मौत बाकी जीव-जंतुओं के साथ हो रही क्रूरता को इंसाफ नहीं दिला पाएगी.

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