मोदी सरकार की किस गलती के कारण लॉकडाउन में मजदूरों ने पलायन किया?

मोदी सरकार की किस गलती के कारण लॉकडाउन में मजदूरों ने पलायन किया?

कोरोना वायरस को लेकर पूरी दुनिया में हंगामा बरपा हुआ है. कोरोना वायरस से निपटने के लिए भारत में लॉकडाउन को लागू किया गया. हालांकि देश में कोरोना के खिलाफ जंग के कारण हुए लॉकडाउन का असर सबसे ज्यादा मजदूर और गरीब वर्ग पर हुआ है. देश में मजदूरों के पलायन की खबर आम हो गई है. कभी दूध के कंटेनर तो कभी माल गाड़ी के डिब्बों में छिपकर मजदूर वर्ग के लोग अपने गांवों की ओर पलायन करते दिखाई दिए. पहले 21 दिनों का लॉकडाउन और उसके बाद 19 दिनों के और लॉकडाउन के ऐलान के बाद तो मानिए मजदूरों की नींद ही हराम हो गई. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या उनके पास पलायन ही एक मात्र विकल्प बचता है? हालांकि सरकार ने मजदूरों को उनके काम करने वाले राज्यों में ही रोकने के इंतजाम किए. लेकिन क्या सभी मजदूरों को सरकार की सुविधाओं का लाभ मिल रहा है, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है? दोस्तों, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) का अध्यन बताता है कि बड़े शहरों में कमाने-खाने वाली आबादी में से 29 फीसदी लोग दिहाड़ी मजदूर होते हैं. वहीं उपनगरीय इलाकों की खाने-कमाने वाली आबादी में दिहाड़ी मजदूर 36 फीसदी हैं. दोस्तों, यह एक बड़ी जनसंख्या है. ऐसे में कई सारे सवाल उठते हैं? क्या सरकार के पास लॉकडाउन से पहले मजदूरों के लिए कोई प्लान था? आखिर मजदूरों के सामने ऐसी क्या समस्याएं आ गई थी कि उन्हें पलायन करना पड़ा? चलिए आज इन सब सवालों के जवाब जानते हैं.

दोस्तों, कोरोना वायरस ने देश की अर्थव्यवस्था के साथ मजदूर वर्ग और कामगारों की कमर भी तोड़ दी है. भारत में एक बड़ी आबादी रोजाना मजदूरी करके अपना घर चलाती है. ऐसे में बिना किसी नोटिस के लॉकडाउन होने से सबसे ज्यादा उनके लिए परेशानी बन गई है. मोदी सरकार ने कोरोना को लेकर कड़ा फैसला लेते हुए देश में 21 दिनों का लॉकडाउन घोषित कर दिया लेकिन मजदूरों के लिए क्या सरकार ने उचित व्यवस्था की थी, यह बड़ा सवाल है? दोस्तों, लॉकडाउन से पहले अगर सरकार के द्वारा मजदूरों के लिए उचित व्यवस्था की गई होती तो इस वर्ग को इतने बड़े पैमाने पर पलायन करने की जरूरत नहीं पड़ती. भारत में एक बड़ी आबादी रोज काम करके जो पैसे मिलते हैं उससे घर चलाती है. ऐसे में एकदम से लॉकडाउन होने से उनकी आमदनी के रास्ते बंद हो गए. जिसके कारण उन्होंने पलायन का रुख अपनाया.

दोस्तों, अगर हम दिल्ली की बात करें तो यहां पर कमाने वाली आबादी में दिहाड़ी मजदूर और गरीब लोग 27 फीसदी हैं. जो दिल्ली की दो करोड़ वाली आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा है. काम के बिना इन पर भूख का साया मंडराने लगा था, जिसके कारण उन्होंने लॉकडाउन के दौरान ही अपने गांवों की ओर पलायन करना शुरू कर दिया. ऐसे में लॉकडाउन से पहले सरकार को उन सभी कदमों और योजनाओं के बारे में घोषणा करनी चाहिए थी जिसके तहत लॉकडाउन के दौरान दिहाड़ी मजदूरों की रोजाना की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में काम किया जा रहा है. जिससे मजदूर वर्ग पलायन की बजाय एक जगह रुक कर इस महामारी का सामना करता.

दोस्तों, लॉकडाउन के कुछ दिनों के अंदर ही जिस तरह की अफरा-तफरी और पलायन की तस्वीरें आई वह काफी डरावनी और चिंताजनक थी. ऐसे में यह सवाल उठता है कि पूर्ण लॉकडाउन का एलान करने से पहले प्रवासियों खासकर रोज कमाने खाने वाले कामगारों को कुछ दिनों पहले अग्रिम नोटिस नहीं दिया जा सकता था? जिससे वे इच्छा होने पर गांव जाने की व्यवस्था कर पाते. इस सवाल के जवाब में कई लोग यह तर्क दे सकते है कि अगर लोगों को उनके घरों को जाने की इजाजत दी जाती तो लॉकडाउन का मकसद ही खत्म हो सकता था क्योंकि ऐसा होने पर ज्यादा से ज्यादा लोग तुरंत अपने गांव जाने की कोशिश करते. अपने घर जाने की जल्दबाजी में वे भीड़ भरी बसों और ट्रेनों में सफर करते. लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि संपूर्ण लॉकडाउन के एलान के बाद हमने जो देखा वो इससे भी बुरा था. क्या आपको नहीं लगता? दोस्तों, कमेंट करके जरूर बताएं.

दोस्तों, लॉकडाउन के बाद केंद्र सरकार ने कई तरह की एडवाइजरी राज्य सरकारों को जारी की. जिससे मजदूर वर्ग और गरीब लोगों का पलायन रोका जा सके. साथ ही इनकी तकलीफों को कम करके इनकी रोजाना की जरूरतों को पूरा किया जा सके. लेकिन तब तक थोड़ी देर हो गई थी और पलायन का सिलसिला तेज हो चुका था. दोस्तों, लॉकडाउन को लेकर सरकार ने मजदूरों के लिए कई तरह की योजनाएं बनाई हुई हैं. लॉकडाउन के दौरान सरकार ने मजदूरों और बीपीएल कार्ड धारकों को गेहूं के फ्री वितरण से लेकर घर-घर खाद्य सामग्री पहुंचाने तक का काम शुरू कर दिया. सरकार ने गरीबों को राहत देने के लिए करोड़ों रुपयों को फंड जारी किया. देशभर के प्रवासी मजदूरों को राहत पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने अपनी मैपिंग प्रक्रिया शुरू की. इसके लिए सरकार राहत शिविरों के साथ नियोक्ताओं के परिसरों और उनके निवास, सभी जगहों की मैपिंग कर रही है. सरकार लाखों मजदूरों का एक डेटाबेस बनाकर कोरोना वायरस के चलते लगाए गए लॉकडाउन के दौरान कितने मजदूरों का रोजगार प्रभावित हुआ इसकी जानकारी इकट्ठा कर रही है, जिससे उनके लिए राहत पैकेज का ऐलान किया जा सके. इसके अलावा उत्तराखंड सहित कई प्रदेशों की सरकारों ने मजदूरों को 1 हजार रुपए प्रतिमाह दिया है. सरकार मजदूरों के बैंक खाते में इस राशि को ट्रांसफर कर रही है. साथ ही जिन लोगों के पास बैंक खाते नहीं हैं उनके लिए अधिकारियों और डाटाबेस की मदद ली जा रही है. वहीं गुजरात सरकार ने 60 लाख परिवारों के 3.25 करोड़ लोगों के लिए मुफ्त राशन मुहैया कराना शुरू कर दिया है. 1अप्रैल से प्रत्येक व्यक्ति को 3.5 किलोग्राम गेहूं और 1.5 किलोग्राम चावल और प्रति परिवार 1 किलो चीनी, दाल और नमक दिया जा रहा है. यह राशन उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया जा रहा है.

दोस्तों, लॉकडाउन के दौरान सभी राज्य सरकारें मजदूरों की मदद के लिए आगे आ रही है. यूपी में सरकार ने मनरेगा और श्रम विभाग में पंजीकृत करीब 1 करोड़ 65 लाख 31 हजार मजदूर को एक महीने का निशुल्क राशन देने के निर्देश जारी किए. इन परिवारों को 20 किलो गेहूं, 15 किलो चावल मुफ्त मिलेगा. इसके अलावा पेंशन का लाभ उठा रहे 83.83 लाख लोगों को दो महीने की अग्रिम पेंशन दी गई है. इसी के साथ देशभर के 80 करोड़ मजदूरों को अगले तीन महीने तक हर माह 5 किलो गेहूं या चावल और पसंद की 1 किलो दालें मुफ्त में दी जा रही हैं. 20 करोड़ महिला जन धन खाता धारकों को अगले तीन महीने तक हर माह 500 रुपये देने के निर्देश जारी हुए हैं. साथ ही मनरेगा के तहत मजदूरी को 182 रुपये से बढ़ाकर 202 रुपये प्रति दिन कर दिया गया है, सरकार की इन योजनाओं से भारत के 13.62 करोड़ परिवार लाभान्वित होंगे. इसी के साथ केंद्र सरकार ने एडवाइजरी जारी करते हुए मजदूरों को अपने प्रदेश में ही रखने के राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं. राज्य सरकारों को गरीब परिवारों और मजदूरों का ध्यान रखना होगा. साथ ही उनकी जरूरत की सभी चीजें उन्हे मुहैया करानी होगी. दोस्तों, इतनी सब एडवाइजरी के बाद भी लोगों को पलायन हो रहा है. चलिए जानते हैं आखिर ऐसी क्या समस्याएं हैं जो मजदूरों को अपने गांव जाने पर मजबूर कर रही हैं?

दोस्तों, लॉकडाउन के कारण मजदूरों के पलायन की कई मुख्य वजह थी. दोस्तों, लॉकडाउन के कारण अलग-अलग प्रदेशों में फंसे प्रवासी मजदूरों के पास काम नहीं था. जिस संस्था या सेक्टर में वह लोग काम करते थे वह भी उनकी मदद नहीं कर पा रहे थे क्योंकि वह भी प्रभावित थे. प्रवासी मजदूरों के पास शहर में रहने को मकान नहीं होता है जिसके कारण वह किराए के मकान में रहते हैं. काम न होने कारण किराया देना उनके बस में नहीं था. इसके साथ हर रोज खाने की समस्या ने उनके हौसले पस्त कर दिए थे. साथ कोरोना महामारी के चलते हुए लॉकडाउन की वजह से काम नहीं मिलने के कारण ज्यादातर मजदूरों के हाथ और जेबें एक तरह से खाली थीं. ऐसे में ये मजदूर गांव जाना चाहते थे क्योंकि वहां शहरों के मुकाबले बेहतर सामाजिक संबंध और सामुदायिक जीवन होता है जो कि उनके गुजर-बसर के लिए बेहतर संभावनाएं दिखाता है. इन दिहाड़ी मजदूरों के पास ऐसी समस्या का सामना करने के लिए कोई बचत भी नहीं थी. वहीं, भारतीयों की आमदनी के लिहाज से बचत की विशेष ज्यादा क्षमता नहीं होती है. ऐसे में मजदूरों के पास पलायन के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं था.

तमाम राज्य सरकारों और केंद्र सरकारों की ओर से रहने और खाने को लेकर दिए जा रहे आश्वासनों के बावजूद बड़ी संख्या में गरीब मजदूर अपने घर की और पलायन इसलिए भी कर रहे हैं क्योंकि उनके मन में अभी भी लॉकडाउन को लेकर एक अनिश्चितता का भाव है कि ये लॉकडाउन कब खत्म होगा. ऐसे में कुछ मजदूरों का ये भी मानना है कि इस महामारी से हम मरे या न मरे भूख से जरूर मर जाएंगे. दोस्तों, इसी डर से प्रवासी मजदूरों ने अपने गांव की ओर पलायन करना शुरू कर दिया है. किसी तरह के ट्रांसपोर्ट की सुविधा न होने के बावजूद मजदूर अपने गांवों की ओर जाने को आतुर हैं. कभी ट्रक में छिपकर तो कभी माल गाड़ी के डिब्बों में बैठकर अपने गांव की ओर पलायन कर रहे हैं. दोस्तों, मजदूरों ने किसी न किसी तरह का ट्रांसपोर्ट मिलने की आस में सड़क मार्ग के रास्ते अपने घरों की ओर जाना तय किया है. खासकर दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से बड़ी संख्या में कारखाना मजदूर और दिहाड़ी कामगार बिहार और उत्तर प्रदेश में स्थित अपने गांवों की ओर पैदल ही निकल पड़े हैं. ऐसे में सरकारों और अन्य संगठनों ने पैदल जा रहे मजदूरों को खाने की व्यवस्था करानी शुरू कर दी है. इसी के साथ सरकार के आदेशों के बाद पैदल जा रहे मजदूरों को उनके निकटतम बने क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती करने की प्रक्रिया भी तेज हो गई है.

दोस्तों, सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया के कई देशों में मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है. हालांकि उनकी संख्या बेहद कम हैं. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि भारत और विदेश में काम कर रहे मजदूरों की आमदनी में अंतर है. जहां भारत में मजदूर वर्ग बचत से दूर ही रहता है वहीं अन्य देशों में मजदूरों के पास कुछ बचत राशि तो मौजूद होती ही है जिसके कारण वह बिना काम के भी कुछ दिनों तक अपनी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं. हालांकि जो मजदूर भारत या अन्य देशों से काम करने गए हैं वह अपने देश में वापस आना ही पसंद कर रहे हैं. यह भी सच है कि भारत की तरह विदेशों में मजदूर वर्ग सड़क पर नहीं उतरा है. विदेशों में ज्यादातर मजदूरों ने एक ही जगह रहकर कोरोना से बचाव का रास्ता अपनाया है.

लॉकडाउन के बढ़ने के बाद एक सवाल और है जो लोगों को परेशान कर रहा है. अगर फिर से एक बार लॉकडाउन बढ़ने की घोषणा हुई तो सरकार के पास मजदूरों और गरीब लोगों के लिए क्या प्लान हैं? दोस्तों, इस सवाल का जवाब बेहद साफ है. सरकार पहले से ही मजदूरों, खाद्य सुरक्षा से जुड़े लोगों और गरीब परिवारों को तीन महीनें तक का राशन फ्री में उपलब्ध करा रही है. साथ ही उनके खातों में 500 से लेकर 1500 रुपये तक भेजे जाने की घोषणा की जा चुकी है. ऐसे में सरकार इस वर्ग को लॉकडाउन के बाद भी सपोर्ट करने का ब्लूप्रिंट बना चुकी है. मजदूरों और कामगारों को अगर लॉकडाउन के बाद भी कुछ दिनों तक घर पर रहना पड़े तो सरकार उनके खाने-पीने की व्यवस्था पहले ही कर चुकी है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो मजदूर और गरीब वर्ग को सरकारी योजनाओं को लाभ अप्रैल माह से मिलना शुरू हो गया है.

दोस्तों, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि लॉकडाउन में सभी वर्ग पर असर पड़ा है. सभी तरह के सेक्टरों पर प्रभाव पड़ रहा है. कोरोना के चलते लोगों को कई तरह की समस्याओं से सामना करना पड़ रहा है. हालांकि कुछ राज्य सरकारों ने प्रदेश में कुछ सेक्टरों को लॉकडाउन के दौरान काम करने की अनुमति देने का मन बनाया है. ऑनलाइन व्यापार वाली चीजों को काम करने की अनुमति दी जा रही है. ऐसे में हमें घर पर ही रहकर खुद का कोरोना से बचाव करना होगा. दोस्तों, कमेंट बॉक्स में कमेंट कर जरूर बताएं कि लॉकडाउन के कारण आपको किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

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