भारत-चीन सीमा पर बंदूक की बजाय पत्थर-लाठियों से क्यों लड़ते हैं सैनिक?

भारत-चीन सीमा पर बंदूक की बजाय पत्थर-लाठियों से क्यों लड़ते हैं सैनिक?

पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी में चीनी सैनिकों से भारतीय सेना की झड़प हुई. इस झड़प में भारत के कई सैनिक शहीद हो गए. इससे पहले साल 1975 में एलएसी पर चीन ने घात लगाकर हमला किया था, जिसमें भारत के चार सैनिक शहीद हुए थे. तब से दोनों देशों में झड़प तो कई बार हुई, लेकिन जान किसी की कभी नहीं गई. 1975 के बाद से कई मौकों पर भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने हुईं. दोनों के बीच हिंसक झड़प हुईं और दोनों ओर से सैनिक घायल भी हुए. मगर इस दौरान एक भी गोली नहीं चली. दोस्तों, क्या आपको पता है कि भारत और चीन के बीच इतनी झड़क होने के बावजूद दोनों देशों के बीच गोलियां क्यों नहीं चलती है?

भारत और चीन के बीच जब भी झड़प होती है तो इस दौरान भारत और चीन के जवान डंडों और पत्थरों से लड़ते हैं. दो परमाणु संपन्न देशों के बीच पत्थरों और लाठी-डंडों से लड़ाई की बात सुनकर थोड़ा अटपटा लग सकता है. दोस्तों, पाकिस्तान की सीमा पर गोलीबारी बहुत ही आम बात हो गई है. पाकिस्तान की ओर से आए दिन सीजफायर का उल्लंघन किया जाता है, जिसके जवाब में भारत को भी कार्रवाई करनी पड़ती है. एलओसी पर आए दिन जवान शहीद होते हैं. इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आता. लेकिन ऐसा चीन की सीमा के साथ नहीं है. चीन की सीमा पर गोलियां नहीं चलती हैं. दरअसल, दोनों देशों के बीच एक समझौते के तहत भारत-चीन की सीमा पर गोली नहीं चलती है.

दरअसल, भारत और चीन ने आपस में तय किया था कि मतभेद कितने ही हों, लेकिन सीमा पर इसका असर नहीं होना चाहिए. सहमति बनी कि सीमा पर तैनात सैनिकों के पास हथियार नहीं होंगे. रैंक के अनुसार जिन अधिकारियों के पास बंदूक होंगी भी तो उनका मुंह जमीन की तरफ होगा. इसी वजह से आए दिन सैनिक बिना हथियारों के ही अपने इलाके से चीनी सैनिकों को खदेड़ते हैं. इसके लिए जवानों को खास तरह की ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि किसी भी सूरत में हथियार का इस्तेमाल न हो.

जानकारी के मुताबिक दोनों देशों के बीच यह सहमति बनी थी कि जब संबंध अच्छे होंगे, तब सीमा के मसले को सुलझाया जाएगा. मगर चीन सीमा पर आक्रामक रुख अपनाता है. पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना कई बार घुसपैठ की कोशिश कर चुकी है. एलएसी पर बड़ी संख्या में सैनिक, वाहन और हथियार पहुंचाए जा रहे हैं. साथ ही चीनी सैनिक भारतीय सीमा में दाखिल होने की कोशिश करती है.

दोस्तों, भारत-चीन सीमा पर कुछ भी हो जाए लेकिन गोली नहीं चलती है. इसके पीछे भारत-चीन 1993 शांति समझौता है. साल 1993 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने चीन का दौरा किया था और दोनों पक्षों ने सीमा शांति के एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. भारत और चीन के बीच आपसी सीमा विवाद को निपटाने के लिए 1993 में हुई संधि में यह तय हुआ कि दोनों देशों की सेनाएं सीमा पर गश्त के दौरान हथियार का इस्तेमाल नहीं करेंगी.

दोस्तों, 1962 में चीन से मिली शिकस्त की टीस आज भी भारतीयों के दिल में बरकरार है, पर इतिहास इसका भी गवाह है कि इस घटना के पांच साल बाद 1967 में हमारे जांबाज सैनिकों ने चीन को जो सबक सिखाया था, उसे वह कभी नहीं भुला पायेगा. 1967 को ऐसे साल के तौर पर याद किया जाता रहेगा जब हमारे सैनिकों ने चीनी दुस्साहस का मुंहतोड़ जवाब देते हुए सैकड़ों चीनी सैनिकों को न सिर्फ मार गिराया था, बल्कि उनके कई बंकरों को ध्वस्त कर दिया था. रणनीतिक स्थिति वाले नाथु ला दर्रे में हुई उस भिड़ंत की कहानी हमारे सैनिकों की जांबाजी की मिसाल है.

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